Thursday, 10 July 2025

माह ए रुख़सार

ख़ामख़ा देखते हैं ईद का चाँद लोग,
देखा नहीं जिन्होंने माह-ए-रुख़सार तेरा।


तेरे इक तबस्सुम पे मायल हो गया मैं,
तेरे इक दीदार ने ले लिया ईमान मेरा।

Monday, 7 December 2020

Sarfaz e ishq (written by me)

छोड़ दिया दामन...
किधर हो चला —
 कोई ख़्वाब था शायद,
जिसके पीछे  फ़त्ह-आश्ना भी गुम हो चला।

था वो सैय्याद-ए-तदबीर,
 न हरज था, न हारी,
इश्क़ की सुलगती सआदत पे मगर सरफ़राज़ हो चला।

Saturday, 11 April 2020

Mujhe bhigne ka shauq hai(written by me)

असीर-ए-ख़लिश हूँ मुद्दतों से,
न राहतें हैं, न आहटें।
नक़्श-ए-क़दम मिटा चुके हैं,
फ़िज़ा में हैं बस सरगुश्तगियाँ।

न गुल है, न सायबाँ कोई,
हवा से मुझे करार है 

मै बेघर, मेरा वतन नहीं
मुझे भीगने का शौक़ है

Monday, 6 April 2020

Saza e Ishq

मुझको मोहब्बत की सज़ा दे गया कोई 
रोज़ मरने की वजह दे गया कोई 
मैं अब भी ब हयात हूँ कैसे 
शायद लम्बी उम्र की बद्दुआ दे गया कोई !

रूह तलक बेकरार है तन्हाई से
यार-ए-गुमशुदा का पता दे गया कोई

ख़्वाब सब जल गये हकीकत बन कर
इश्क़ को फिर से अज़ाब-ए-ख़ुदा दे गया कोई

सुब्ह तक आँखों में ख़लिश बाक़ी थी अहमद 
शब में वीरानियों को सदा दे गया कोई

शम्मा दहक उठी फिर, मेरे दिल के आँगन में 
हवा को मेरे  घर का  पता दे गया कोई 

 

Monday, 11 November 2019

इश्क़-ए-नातमाम

महर की गर्मी से जलते हैं सब ख़्वाब,
ख़ुरशीद भी कभी-कभी साया माँगता है।

दिल में बसी हों कुछ परछाइयाँ पुरानी,
चराग़-ए-वक़्त भी तो हवा को ढाँपता है।

यादों के क़ाफ़िले रुके नहीं अब तलक,
हर मोड़ पे एक चेहरा सवाली  दिखता है।

ख़ामोशियाँ भी चीख़ती होंगी रातों में,
सन्नाटा भी  तो कभी सदा को सुनता है।

Sunday, 3 November 2019

Jawab e Dil (Malali reply of Parveen Shakir Shayri)

गुज़र गए  हज़ार आफ़्ताब ब-अंजुमन,
वो माह-ए-ताबाँ भी आज बस्र-ए-रहम में आया।

तोड़ दिया जब दम, तो अहमद 
क्या ही अहम कि बंदा अयादत में आया 

Sunday, 3 February 2019

कशिश ए इश्क़

मुझको मोहब्बत की सज़ा दे गया कोई 
रोज़ मरने की वजह दे गया कोई 

मैं अब भी ब हयात हूँ कैसे 
शायद लम्बी उम्र की बद्दुआ दे गया कोई 


रूह तलक बेकरार है तन्हाई से
यार-ए-गुमशुदा का पता दे गया कोई

ख़्वाब सब जल गये हकीकत बन कर
इश्क़ को फिर से अज़ाब-ए-ख़ुदा दे गया कोई

सुब्ह तक आँखों में ख़लिश बाक़ी थी अहमद 
शब में वीरानियों को सदा दे गया कोई

शम्मा दहक उठी फिर, मेरे दिल के आँगन में 
हवा को मेरे  घर का  पता दे गया कोई