मुझको मोहब्बत की सज़ा दे गया कोई
रोज़ मरने की वजह दे गया कोई
मैं अब भी ब हयात हूँ कैसे
शायद लम्बी उम्र की बद्दुआ दे गया कोई
रूह तलक बेकरार है तन्हाई से
यार-ए-गुमशुदा का पता दे गया कोई
ख़्वाब सब जल गये हकीकत बन कर
इश्क़ को फिर से अज़ाब-ए-ख़ुदा दे गया कोई
सुब्ह तक आँखों में ख़लिश बाक़ी थी अहमद
शब में वीरानियों को सदा दे गया कोई
शम्मा दहक उठी फिर, मेरे दिल के आँगन में
हवा को मेरे घर का पता दे गया कोई
No comments:
Post a Comment