Monday, 11 November 2019

इश्क़-ए-नातमाम

महर की गर्मी से जलते हैं सब ख़्वाब,
ख़ुरशीद भी कभी-कभी साया माँगता है।

दिल में बसी हों कुछ परछाइयाँ पुरानी,
चराग़-ए-वक़्त भी तो हवा को ढाँपता है।

यादों के क़ाफ़िले रुके नहीं अब तलक,
हर मोड़ पे एक चेहरा सवाली  दिखता है।

ख़ामोशियाँ भी चीख़ती होंगी रातों में,
सन्नाटा भी  तो कभी सदा को सुनता है।

Sunday, 3 November 2019

Jawab e Dil (Malali reply of Parveen Shakir Shayri)

गुज़र गए  हज़ार आफ़्ताब ब-अंजुमन,
वो माह-ए-ताबाँ भी आज बस्र-ए-रहम में आया।

तोड़ दिया जब दम, तो अहमद 
क्या ही अहम कि बंदा अयादत में आया 

Sunday, 3 February 2019

कशिश ए इश्क़

मुझको मोहब्बत की सज़ा दे गया कोई 
रोज़ मरने की वजह दे गया कोई 

मैं अब भी ब हयात हूँ कैसे 
शायद लम्बी उम्र की बद्दुआ दे गया कोई 


रूह तलक बेकरार है तन्हाई से
यार-ए-गुमशुदा का पता दे गया कोई

ख़्वाब सब जल गये हकीकत बन कर
इश्क़ को फिर से अज़ाब-ए-ख़ुदा दे गया कोई

सुब्ह तक आँखों में ख़लिश बाक़ी थी अहमद 
शब में वीरानियों को सदा दे गया कोई

शम्मा दहक उठी फिर, मेरे दिल के आँगन में 
हवा को मेरे  घर का  पता दे गया कोई