Saturday, 11 April 2020

Mujhe bhigne ka shauq hai(written by me)

असीर-ए-ख़लिश हूँ मुद्दतों से,
न राहतें हैं, न आहटें।
नक़्श-ए-क़दम मिटा चुके हैं,
फ़िज़ा में हैं बस सरगुश्तगियाँ।

न गुल है, न सायबाँ कोई,
हवा से मुझे करार है 

मै बेघर, मेरा वतन नहीं
मुझे भीगने का शौक़ है

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