महर की गर्मी से जलते हैं सब ख़्वाब,
ख़ुरशीद भी कभी-कभी साया माँगता है।
दिल में बसी हों कुछ परछाइयाँ पुरानी,
चराग़-ए-वक़्त भी तो हवा को ढाँपता है।
यादों के क़ाफ़िले रुके नहीं अब तलक,
हर मोड़ पे एक चेहरा सवाली दिखता है।
ख़ामोशियाँ भी चीख़ती होंगी रातों में,
सन्नाटा भी तो कभी सदा को सुनता है।