Monday, 9 July 2018

फ़र्दा-ए-विसाल (written by me)

फ़र्दा-ए-विसाल तू न देख, कि मंज़िल नहीं है,  
हर लम्हा जो गुज़रा, वो अब दस्तगीर नहीं है।  
तक़दीर ने लिखा था जो, वो इक अफ़साना था,  
मोहब्बत की किताब में ये सफ़हा ताज़ा नहीं है।

Sunday, 8 July 2018

तास्सुर से परे

मुझको आती जाती नज़रों से न देख,
मैं वुजूद-ए-बे-सबब हूँ, तास्सुर न रख।

मैं वो सवाल हूँ जो जवाबों से खौफ़ खाता है,
मेरी ख़ामोशी को तर्जुमा न दे, असर न रख।

तू तो हर रंग में फ़रेब सा लगता है,
मेरे सियाह लहजे पे कोई उजाला न रख।

ज़माना चुप है, मगर मैं बोल पड़ूँ तो...
तेरे हर झूठ पे गर्दिश-ए-वक़्त भी गवाह रख।

अहमद, फ़िज़ा भी अब दस्तक नहीं देती,
इस शहर-ए-तन्हाई में ख़ुद को रवाँ न रख।