Ahmed Muazzam Utraulvi
Monday, 9 July 2018
फ़र्दा-ए-विसाल (written by me)
फ़र्दा-ए-विसाल तू न देख, कि मंज़िल नहीं है,
हर लम्हा जो गुज़रा, वो अब दस्तगीर नहीं है।
तक़दीर ने लिखा था जो, वो इक अफ़साना था,
मोहब्बत की किताब में ये सफ़हा ताज़ा नहीं है।
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