Sunday, 8 July 2018

तास्सुर से परे

मुझको आती जाती नज़रों से न देख,
मैं वुजूद-ए-बे-सबब हूँ, तास्सुर न रख।

मैं वो सवाल हूँ जो जवाबों से खौफ़ खाता है,
मेरी ख़ामोशी को तर्जुमा न दे, असर न रख।

तू तो हर रंग में फ़रेब सा लगता है,
मेरे सियाह लहजे पे कोई उजाला न रख।

ज़माना चुप है, मगर मैं बोल पड़ूँ तो...
तेरे हर झूठ पे गर्दिश-ए-वक़्त भी गवाह रख।

अहमद, फ़िज़ा भी अब दस्तक नहीं देती,
इस शहर-ए-तन्हाई में ख़ुद को रवाँ न रख।

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